कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक परिवर्तन: एक समाजशास्त्रीय सैद्धांतिक विश्लेषण।

Authors

  • आशीष चन्द्रवंशी

Keywords:

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक परिवर्तन, डिजिटल समाज, तकनीकी निर्धारणवाद, समाजशास्त्रीय सिद्धांत, डिजिटल विभाजन।

Abstract

इक्कीसवीं शताब्दी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव सभ्यता के इतिहास में एक क्रांतिकारी तकनीकी परिवर्तन के रूप में उभरी है। यह केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं है,  सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक प्रक्रियाओं, आर्थिक संबंधों, राजनीतिक व्यवस्थाओं तथा मानवीय क्रियाओं को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति के रूप में विकसित हो रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, प्रशासन, संचार, रोजगार तथा सामाजिक नियंत्रण जैसे विविध क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण सेकृत्रिम बुद्धिमत्तासामाजिक परिवर्तन का एक प्रमुख अभिकर्ता बन चुकी है, जो सामाजिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली, सामाजिक संबंधों की प्रकृति तथा शक्ति-संरचनाओं के वितरण को प्रभावित कर रही है।

प्रस्तुत अध्ययन समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के आलोक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक परिवर्तन के मध्य अंतर्संबंधों का सैद्धांतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में संरचनात्मक-कार्यात्मकतावाद, संघर्ष सिद्धांत, प्रतीकात्मक क्रियावाद तथा उत्तर-आधुनिकतावादी दृष्टिकोणों के माध्यम सेकृत्रिम बुद्धिमत्ताके सामाजिक प्रभावों की व्याख्या की गई है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है किकृत्रिम बुद्धिमत्तासामाजिक दक्षता, उत्पादकता तथा ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है, किंतु इसके साथ-साथ सामाजिक असमानता, डिजिटल विभाजन, निगरानी संस्कृति तथा रोजगार विस्थापन जैसी चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं। अध्ययन निष्कर्षतः यह प्रतिपादित करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं है,  यह व्यापक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन चुकी है।

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How to Cite

आशीष चन्द्रवंशी. (2025). कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक परिवर्तन: एक समाजशास्त्रीय सैद्धांतिक विश्लेषण।. International Journal of Engineering Science & Humanities, 15(4), 1034–1041. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/932

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