बिहार में सूखा, अकाल और सामाजिक संरचना: दक्षिण बिहार के पठारी क्षेत्रों में पर्यावरणीय संकट और जनसामान्य का प्रतिरोध (1770-1943)
Keywords:
सूखा, अकाल, दक्षिण बिहार, पठारी क्षेत्र, आहर-पाइन, औपनिवेशिक भू-राजस्व, किसान प्रतिरोध, पर्यावरणीय इतिहासAbstract
दक्षिण बिहार का पठारी क्षेत्र — गया, नवादा, औरंगाबाद, रोहतास, जहानाबाद और अरवल — भारतीय उपमहाद्वीप के सर्वाधिक सूखा-प्रवण और अकाल-पीड़ित क्षेत्रों में रहा है। प्रस्तुत शोधपत्र 1770 के महा-अकाल से लेकर 1943 के बंगाल अकाल तक लगभग दो शताब्दियों की अवधि में इस क्षेत्र के पर्यावरणीय संकटों, उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और जनसामान्य के प्रतिरोध का दीर्घकालिक ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन पर्यावरणीय इतिहास, नैतिक अर्थव्यवस्था (Moral Economy) सिद्धान्त और निम्नवर्गीय अध्ययन के सैद्धान्तिक ढाँचे पर आधारित है। शोध में पाया गया कि दक्षिण बिहार में प्रत्येक दशक में औसतन 3-5 सूखा-वर्ष आए, जिनमें 2-3 गम्भीर सूखे थे, और 1770-1943 के बीच कम-से-कम सात बड़े अकाल ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया। औपनिवेशिक नीतियों — स्थायी बन्दोबस्त (1793), नील और अफ़ीम की जबरन खेती, अन्न-निर्यात और वन-आरक्षण — ने प्राकृतिक सूखे को मानव-निर्मित अकाल में रूपान्तरित किया। पारम्परिक आहर-पाइन सिंचाई प्रणाली, जो 1793 से पूर्व 90% क्षेत्र को सिंचित करती थी, औपनिवेशिक काल में ध्वस्त होकर 1943 तक मात्र 15% कार्यशील रह गयी। जातिगत विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि अकाल-मृत्यु दर दलित (मुसहर, दुसाध) और आदिवासी (उराँव, सन्थाल) समुदायों में सवर्ण जातियों की तुलना में 4-5 गुना अधिक थी। जनसामान्य ने पर्यावरणीय संकटों के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध भी किया — सन्यासी-फ़कीर विद्रोह (1770-1800), कोल विद्रोह (1831-32), सन्थाल हूल (1855-56), नील विद्रोह (1859-60) और किसान सभा आन्दोलन (1929-43) इसी प्रतिरोध की अभिव्यक्तियाँ थीं।
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