धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ में महाभारत के पुनर्पाठ द्वारा आधुनिक समाज की नैतिक एवं दार्शनिक व्याख्या
Keywords:
अंधायुग, महाभारत, नैतिक संकट, दार्शनिक व्याख्या, आधुनिक समाजAbstract
धर्मवीर भारती के नाट्यकाव्य अंधायुग में महाभारत के आख्यान का पुनर्पाठ करते हुए आधुनिक समाज की नैतिक एवं दार्शनिक स्थितियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह कृति महाभारत के युद्धोत्तर परिदृश्य को आधार बनाकर मानव अस्तित्व के संकट, मूल्यहीनता, और नैतिक पतन को उजागर करती है। नाटक में पात्र केवल ऐतिहासिक या पौराणिक नहीं रहते, बल्कि वे आधुनिक समाज की मानसिक प्रवृत्तियों—जैसे हिंसा, प्रतिशोध, अंधता और नैतिक द्वंद्व—के प्रतीक बन जाते हैं। भारती ने युद्ध के विनाशकारी परिणामों के माध्यम से यह दिखाया है कि जब धर्म और नैतिकता का ह्रास होता है, तब समाज “अंधायुग” में प्रवेश कर जाता है। इस प्रकार, यह कृति मिथक और आधुनिकता के समन्वय द्वारा मानव जीवन के गहरे दार्शनिक प्रश्नों—कर्म, नियति और उत्तरदायित्व—की सार्थक व्याख्या करती है।
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