माध्यमिक विज्ञान शिक्षा का पियाजेवादी पुनर्संरचनात्मक प्रतिपाठ कुहन के प्रतिमान परिवर्तन के आलोक में एक दार्शनिक विश्लेषण
Keywords:
पियाजेवादी ज्ञानमीमांसा, कुहनीय प्रतिमान, पुनर्संरचनावाद, माध्यमिक विज्ञान शिक्षा, दार्शनिक विश्लेषण, संज्ञानात्मक असंगति, वैज्ञानिक क्रान्ति, शिक्षण-अधिगम प्रक्रियाAbstract
प्रस्तुत शोध-पत्र माध्यमिक विज्ञान शिक्षा की वर्तमान संरचना का दार्शनिक पुनर्पाठ करता है। यह अध्ययन जीन पियाजे की संज्ञानात्मक विकास-सिद्धान्त — विशेषतः समावेशन (assimilation), समायोजन (accommodation) एवं साम्यावस्था (equilibration) — तथा थॉमस एस. कुहन के वैज्ञानिक प्रतिमान परिवर्तन (paradigm shift) की अवधारणा को एक समन्वित दार्शनिक ढाँचे में प्रस्तुत करता है। शोध का केन्द्रीय तर्क यह है कि माध्यमिक स्तर पर विज्ञान शिक्षण की परम्परागत संचारणवादी (transmissive) पद्धति न केवल पियाजेवादी संज्ञानात्मक तर्क का खण्डन करती है, अपितु कुहनीय अर्थों में एक 'असंगत प्रतिमान' (incommensurable paradigm) के रूप में भी कार्य करती है। विश्लेषण के लिए गुणात्मक दार्शनिक अनुसन्धान-पद्धति (qualitative philosophical inquiry), द्वन्द्वात्मक-तर्क-विश्लेषण (dialectical argumentation) तथा अवधारणात्मक-मानचित्रण (conceptual mapping) का उपयोग किया गया है। निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि एक पुनर्संरचनात्मक-प्रतिपाठ (reconstructivist counter-text) की आवश्यकता है जो शिक्षार्थी की पूर्व-अवधारणाओं (prior conceptions) को वैध ज्ञान-स्रोत के रूप में स्वीकार करे तथा वैज्ञानिक संकट (scientific crisis) की प्रक्रिया को कक्षाकक्षीय प्रवचन (classroom discourse) में समाहित करे। यह शोध राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं NCERT के पाठ्यक्रम-पुनर्निर्माण के संदर्भ में नीतिगत निहितार्थ भी प्रस्तुत करता है।
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