भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक नैतिकता के संदर्भ में बिहार के वृद्धाश्रम: परम्परा, संक्रमण और दिशाएँ

Authors

  • पुष्पा कुमारी, डॉ. थल्लापल्ली मनोहर

Keywords:

वृद्धाश्रम, बिहार, भारतीय सांस्कृतिक मूल्य, पारिवारिक नैतिकता, संयुक्त परिवार, वृद्धजन कल्याण, नगरीकरण, सामाजिक परिवर्तन

Abstract

भारतीय समाज में वृद्धजनों की देखभाल सदैव परिवार का नैतिक और सांस्कृतिक दायित्व रहा है। संयुक्त परिवार प्रणाली, पितृ-सेवा की धार्मिक अवधारणा, और वानप्रस्थ आश्रम की दार्शनिक परम्परा—ये सब मिलकर एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करते रहे हैं जिसमें वृद्धजनों को परिवार के भीतर ही सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था [1], [2]। परन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से, विशेषकर आर्थिक उदारीकरण के पश्चात, इस परम्परा में तीव्र परिवर्तन आया है। नगरीकरण, प्रवासन, एकल परिवारों का विस्तार और आर्थिक दबाव ने संयुक्त परिवार की संरचना को कमजोर किया है, जिसके परिणामस्वरूप वृद्धाश्रमों की आवश्यकता और संख्या दोनों में वृद्धि हुई है [3], [4]। यह शोधपत्र बिहार राज्य के वृद्धाश्रमों का अध्ययन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक नैतिकता के ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत करता है। मिश्रित शोध पद्धति (mixed-methods approach) का उपयोग करते हुए, 38 वृद्धाश्रमों में 420 निवासियों का सर्वेक्षण और 85 अर्ध-संरचित साक्षात्कार किए गए। शोध में पाया गया कि वृद्धाश्रम में प्रवेश का सबसे प्रमुख कारण संतानों का नगरों या विदेशों में प्रवासन (32.4 प्रतिशत) है, जबकि पारिवारिक संघर्ष और उपेक्षा (24.8 प्रतिशत) दूसरा प्रमुख कारण है। अधिकांश निवासी (70 प्रतिशत) पुत्र-धर्म और पारिवारिक दायित्व की सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास रखते हैं, परन्तु व्यावहारिक स्तर पर यह मूल्य क्षीण हो रहा है। शोध यह प्रतिपादित करता है कि बिहार में वृद्धाश्रमों का विकास परम्परा और आधुनिकता के बीच के तनाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

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पुष्पा कुमारी, डॉ. थल्लापल्ली मनोहर. (2019). भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक नैतिकता के संदर्भ में बिहार के वृद्धाश्रम: परम्परा, संक्रमण और दिशाएँ. International Journal of Engineering Science & Humanities, 9(3), 42–54. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/668

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