गांधी का आत्मनिर्भरता (स्वदेशी) सिद्धांत और आत्मनिर्भर भारत
Keywords:
स्वदेशी सिद्धांत, आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर भारत, ग्राम स्वराज, स्थानीय आर्थिक विकासAbstract
प्रस्तुत अध्ययन स्पष्ट करता है कि महात्मा गांधी का आत्मनिर्भरता या स्वदेशी सिद्धांत केवल ‘आत्मनिर्भर भारत’ की वैचारिक नींव ही नहीं, बल्कि इसके सफल कार्यान्वयन के लिए एक सशक्त मूल्य-आधारित मार्गदर्शक भी है। शोध के परिणामों से पता चलता है कि स्वदेशी सिद्धांत को अपनाने से स्थानीय उत्पादन में लगभग 70-80% की वृद्धि हुई है, जबकि आयात निर्भरता 65% से घटकर 40% तक आई है। साथ ही, स्थानीय रोजगार सृजन में 52% से बढ़कर 78% का उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। MSME क्षेत्र की भागीदारी भी 58% से बढ़कर 82% हो गई है, जो आर्थिक संरचना को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाती है। मूल्यगत दृष्टि से, यह सिद्धांत आत्मसम्मान, श्रम की गरिमा, सामाजिक समानता और सामूहिक उत्तरदायित्व जैसे नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है। स्वदेशी विचारधारा केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं रहकर सामाजिक न्याय, समावेशन और सतत विकास जैसे मानवीय मूल्यों को भी प्रोत्साहित करती है। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि आत्मनिर्भर भारत की नीतियों में स्वदेशी मूल्य शामिल करने से समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है और दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है। अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गांधी का स्वदेशी सिद्धांत आधुनिक भारत के न्यायसंगत, समावेशी और मूल्य-आधारित विकास के लिए अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक है, जो देश को सतत विकास की ओर अग्रसर करता है।
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