राष्ट्रीयता एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान: भारतेंदु के नाट्य-शिल्प और कथ्य का अंतर्संबंध।
Keywords:
भारतेंदु हरिश्चंद्र, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, नाट्य शिल्प, हिंदी नवजागरणAbstract
उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध भारतीय नवजागरण का संक्रमणकाल था, जहाँ औपनिवेशिक दमन, सांस्कृतिक हीनताबोध और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध एक सशक्त वैचारिक प्रतिक्रिया आकार ले रही थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र इस नवजागरण के अग्रदूत के रूप में हिंदी नाटक को आधुनिक चेतना से जोड़ते हैं, राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रभावी माध्यम भी बनाते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र भारतेंदु के नाट्य-साहित्य में निहित राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और शिल्पगत सौंदर्य के अंतर्संबंध का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन(राष्ट्रीयता), (सांस्कृतिक पुनरुत्थान) तथा(नाट्य शिल्प) के वैचारिक सूत्रों को एकीकृत करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि भारतेंदु का नाट्य-शिल्प कथ्य का अनुगामी न होकर उसका सहचर है, जो राष्ट्रीय विचारधारा को सौंदर्यात्मक प्रभावशीलता प्रदान करता है।
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