नवदोत्तरी हिंदी उपन्यासों में नारी-अस्मिता, आत्मसंघर्ष एवं स्त्री-स्वतंत्रता: एक विवेचनात्मक अध्ययन
Keywords:
नारी-अस्मिता, आत्मसंघर्ष, स्त्री-स्वतंत्रता, स्त्री-विमर्श, नवदोत्तरी हिंदी उपन्यासAbstract
हिंदी उपन्यास साहित्य में स्त्री-जीवन का चित्रण आरंभ से ही सामाजिक यथार्थ के साथ जुड़ा रहा है, परन्तु नवदोत्तरी दौर में यह चित्रण अधिक सजग, आलोचनात्मक और अस्मितामूलक हो उठा है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों के विस्तार ने स्त्री के आत्मबोध को नई दिशा दी, जिसका प्रभाव समकालीन कथा-साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है (गोस्वामी, 2017)। नारी-अस्मिता का प्रश्न अब केवल स्त्री की सामाजिक स्थिति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उसकी आत्मपहचान, आत्मसम्मान, आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता जैसे बहुआयामी मुद्दों से जुड़ गया है (अनामिका, 2020)। प्रस्तुत शोध पत्र में मृदुला गर्ग के कठगुलाब, मैत्रेयी पुष्पा के चाक, प्रभा खेतान के छिन्नमस्ता, चित्रा मुद्गल के आवाँ तथा ममता कालिया के एक पत्नी के नोट्स जैसे प्रतिनिधि उपन्यासों के आधार पर यह विश्लेषण किया गया है कि स्त्री अपने अस्तित्व की खोज, आत्मसंघर्ष और सामाजिक प्रतिरोध के माध्यम से किस प्रकार स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्थापना करती है। अध्ययन का उद्देश्य केवल कथा-वस्तु का विवरण देना नहीं, बल्कि समकालीन स्त्री-विमर्श के सैद्धांतिक ढाँचे में इन उपन्यासों की स्त्री-चेतना का पुनर्मूल्यांकन करना है (अग्रवाल, 2019)। इस दृष्टि से यह पत्र बारह खण्डों में विभाजित है, जिनमें अस्मिता की अवधारणा से लेकर परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व तक स्त्री-जीवन के विविध पक्षों की पड़ताल की गई है।
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