हरियाणा का लोकसंगीत: एक शोधात्मक अध्ययन

Authors

  • डाॅ॰ पूर्णचन्द शर्मा
  • डाॅ॰ अशोक कुमार शर्मा

Keywords:

कामिनियाँ गेहूँ, भावमुद्राओं, संगीताचार्य, मर्मज्ञ कृष्णचन्द्र शर्मा, धार्मिक भावना, देवी-देवताओं

Abstract

मनुष्य के लिए तन की पुष्टि एवं मन की तुष्टि दोनों ही अनिवार्य है। मन, तन पर शासन करता है, अतः इसका उत्फुल्ल एवं स्वस्थ रहना और भी आवश्यक है। शरीर की मज़बूती के लिए जितना महत्त्व पौष्टिक आहार का है, उतना ही महत्त्व मन की प्रसन्नता के लिए मनोरंजन का भी है। वस्तुतः मनुष्य की मनोरंजनात्मक वृत्ति ही उसे पशु से अलगाती है।
मनुष्य की इस सहज एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि ”जब मनुष्य के पेट में भूख खांव-खांव कर रही थी, तब भी उसकी आँखें गुलाब पर टंगी थीं, टंकी थी। उसका प्रथम संगीत निकला जब उसकी कामिनियाँ गेहूँ को ऊखल और चक्की में कूट-पीस रही थीं। पशुओं को मारकर खाकर ही वह तृप्त नहीं हुआ, उसकी खाल का बनाया ढोल और उसके सींग की बनाई तुरही। मछली मारने के लिए जब वह अपनी नाव में पतवार का पंख लगाकर उसे जल पर उड़ाए जा रहा था, तब उसके छप-छप में उसने ताल पाई, तराने छेड़े, बांस से उसने लाठी ही नहीं बाँसुरी भी बनाई।“ इस कथन से सिद्ध होता है कि संगीत अनादिकाल से ही मानव-जीवन का अभिन्नांग रहा है।

References

. डाॅ॰ पूर्णचन्द शर्मा, हरियाणवी साहित्य और सस्कृति (1990), पृ॰ 39-40

. सुरेशचन्द्र बन्धोपाध्याय (अनुवादक) संगीत रत्नाकर, पृ॰ 5

. डाॅ॰ शरच्चन्द परांजपे, सगीत बोध, पृ॰ 175

. राम अवतार वीर, भारतीय संगीत का इतिहास (1996), पृ॰ 17

. कृष्णचन्द्र शर्मा, कविसूर्य लखमीचन्द (2001), पृ॰ 63

. गीतं वाद्यं च नृत्यं च नाट्य विष्णुकथा मुने।

यः करोति स पुण्यात्मा त्रिलोक्योपरि संस्थित।। (स्कन्दपुराण)

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How to Cite

डाॅ॰ पूर्णचन्द शर्मा, & डाॅ॰ अशोक कुमार शर्मा. (2025). हरियाणा का लोकसंगीत: एक शोधात्मक अध्ययन. International Journal of Engineering Science & Humanities, 15(4), 594–620. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/535