सतत विकास की चुनौतियों के समाधान में गांधीवादी सर्वोदय की प्रासंगिकता

Authors

  • हरिभाऊ ज्ञानेश्वर सोनुने, डॉ. जॉन चेल्लादुराई,

Keywords:

सतत विकास, गांधीवाद, सर्वोदय, ग्राम स्वराज, ट्रस्टीशिप, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय, स्वदेशी, सतत विकास लक्ष्य।

Abstract

इक्कीसवीं शताब्दी में मानव सभ्यता ने अभूतपूर्व वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति हासिल की है, फिर भी वह जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान वृद्धि, पर्यावरण प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन, आर्थिक विषमता, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता तथा नैतिक मूल्यों के ह्रास जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। आर्थिक वृद्धि को केंद्र में रखने वाले पारंपरिक विकास मॉडल ने उत्पादन और उपभोग को बढ़ाया है, किन्तु मानव और प्रकृति के मध्य संतुलन स्थापित करने में सफलता नहीं पाई है। इसी संदर्भ में सतत विकास की अवधारणा विश्व समुदाय के समक्ष एक वैकल्पिक विकास प्रतिमान के रूप में उभरी है, जिसका उद्देश्य वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना है। महात्मा गांधी का सर्वोदय दर्शन ठीक इसी प्रकार के संतुलित, नैतिक और मानव-केंद्रित विकास की वकालत करता है। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, ट्रस्टीशिप, आत्मनिर्भरता, सीमित उपभोग और सर्वजन हित इसके मूल स्तंभ हैं। गांधीजी का विश्वास था कि विकास तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखते हुए मानव कल्याण सुनिश्चित हो। गांधीवादी सर्वोदय दर्शन आधुनिक सतत विकास के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय तीनों आयामों के साथ गहरा सामंजस्य रखता है। प्रस्तुत शोध आलेख सतत विकास की अवधारणा, उसकी समकालीन चुनौतियों तथा गांधीवादी सर्वोदय की प्रासंगिकता का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान वैश्विक संकटों के समाधान के लिए केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि नैतिक, मानवीय और मूल्य-आधारित विकास दृष्टिकोण भी अपरिहार्य है। गांधीवादी सर्वोदय आज भी सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक समानता और समावेशी विकास के लिए एक प्रासंगिक एवं प्रभावी वैचारिक आधार प्रदान करता है।

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How to Cite

हरिभाऊ ज्ञानेश्वर सोनुने, डॉ. जॉन चेल्लादुराई,. (2026). सतत विकास की चुनौतियों के समाधान में गांधीवादी सर्वोदय की प्रासंगिकता. International Journal of Engineering Science & Humanities, 16(3), 259–269. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/1063

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