नारीवादी विमर्श, आधुनिक समाज और साहित्य में स्त्रियों के अधिकार

Authors

  • Kismatun Begum, Dr. Vandana Gupta

Keywords:

नारीवाद, स्त्री-अधिकार, आधुनिक समाज, हिंदी साहित्य, पितृसत्ता, लैंगिक समानता, स्त्री विमर्श, महिला सशक्तिकरण, साहित्य और समाज, स्त्री चेतना

Abstract

नारीवादी विमर्श आधुनिक युग के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा साहित्यिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। यह केवल स्त्रियों की स्वतंत्रता अथवा समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में स्थापित पितृसत्तात्मक संरचनाओं, लैंगिक असमानताओं, सामाजिक अन्याय तथा सांस्कृतिक रूढ़ियों के विरुद्ध एक व्यापक वैचारिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ है। वर्तमान शोध पत्र का उद्देश्य आधुनिक समाज और साहित्य में स्त्रियों के अधिकारों का अध्ययन करना है तथा यह विश्लेषण करना है कि नारीवादी चिंतन ने किस प्रकार स्त्री-अधिकारों, शिक्षा, राजनीतिक सहभागिता, आर्थिक स्वतंत्रता और साहित्यिक अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है।
शोध में गुणात्मक तथा वर्णनात्मक अनुसंधान पद्धति का प्रयोग किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नारीवादी विमर्श ने आधुनिक समाज में स्त्रियों के अधिकारों के प्रति व्यापक जागरूकता उत्पन्न की है, किन्तु अभी भी लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा, वेतन असमानता तथा सामाजिक रूढ़ियों जैसी अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। साहित्य ने स्त्रियों की पीड़ा, संघर्ष, आत्मनिर्भरता तथा अस्तित्व-बोध को अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी साहित्य में महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग तथा प्रभा खेतान जैसी लेखिकाओं ने स्त्री-अस्मिता को नई दिशा प्रदान की।

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How to Cite

Kismatun Begum, Dr. Vandana Gupta. (2021). नारीवादी विमर्श, आधुनिक समाज और साहित्य में स्त्रियों के अधिकार. International Journal of Engineering Science & Humanities, 11(3), 43–58. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/896