अभिज्ञानशाकुन्तलम्: - मानव-प्रकृति से तादात्म्य संधारणीयता

Authors

  • डॉ. सुमन

Keywords:

अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मानव-प्रकृति तादात्म्य, संधारणीयता

Abstract

आज की सभ्यता एक विचित्र एवं विडम्बनापूर्ण विरोधाभास से गुज़र रही है । सुविधाएँ जितनी विस्तृत और व्यापक हुई हैं, प्रकृति से  आत्मीय एवं सहज संबंध उतना ही क्षीण होता गया है।  वायु, जल, वन और जीव-जगत् संसाधन की श्रेणी में आ गए हैं और मनुष्य का मन उसी अनुपात में अशान्त हो गया है। प्रस्तुत शोधपत्र इस दोहरे संकट को सामने रखकर महाकवि कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का पुनर्पाठ करता है। अध्ययन की एक संरचनागत विशेषता उल्लेखनीय है कि यहाँ श्लोक विषयवार बिखेरकर नहीं, अपितु नाटक के अपने क्रम में लिए गए हैं।  नान्दी से लेकर भरतवाक्य तक, जिससे कवि की प्रकृति-दृष्टि का क्रमिक विकास स्वयं उद्घाटित होता चला गया । नान्दी की अष्टमूर्ति-वन्दना प्रकृति के प्रत्यक्ष तत्त्वों को ईश्वर की देह के रूप में प्रतिष्ठित करती है। प्रथम अंक का आखेट-निषेध और मृगों का ‘विश्वासोपगम’ तपोवन को अभयारण्य के रूप में खड़ा करता है । द्वितीय अंक का ‘अनाघ्रातं पुष्पम्’ अस्पृष्ट रहने देने के सौन्दर्य को स्वर देता है।  चतुर्थ अंक शकुन्तला के जल-पोषण, नवपल्लव-संयम, प्रकृति की वियोग-वेदना और घायल मृगशावक की चिकित्सा में तादात्म्य का चरम दिखाता है। पंचम एवं षष्ठ अंक मन और परिवेश की परस्परता उभारते हैं और सप्तम् अंक का मारीच-आश्रम संयमित उपभोग तथा निर्भय सह-अस्तित्व का प्रतिमान बनकर भरतवाक्य के ‘प्रकृतिहिताय’ में समाहित हो जाता है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि कालिदास के अनुसार प्रकृति-रक्षा और आत्म-रक्षा दो अलग-अलग कार्य नहीं अपितु एक ही जीवन-दृष्टि के दो पक्ष हैं । यही वह बिन्दु है जहाँ प्राचीन काव्य आधुनिक संधारणीयता-विमर्श से सार्थक संवाद कर सकता है।

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How to Cite

डॉ. सुमन. (2026). अभिज्ञानशाकुन्तलम्: - मानव-प्रकृति से तादात्म्य संधारणीयता. International Journal of Engineering Science & Humanities, 16(04), 140–152. Retrieved from https://www.ijesh.com/j/article/view/1277