गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि‘ में किन्नर विमर्ष
Keywords:
रेत समाधि, किन्नर विमर्ष, सामाजिक बहिष्कार, मानवीय गरिमाAbstract
साहित्य में सभी का हित छुपा होता है, साहित्य मार्गदर्षन का कार्य करता है। साहित्य समाज के उन पक्षों को भी सामने लाने का प्रयास करता है जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। समाज का ऐसा ही अनदेखा किया गया तथा उपेक्षित शोषित वर्ग किन्नर वर्ग है। किन्नरों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि‘ इस संदर्भ में विषेष महत्व रखता है। ‘रेत समाधि‘ में किन्नर विमर्ष केवल किन्नर पात्र की उपस्थिति नहीं है बल्कि उसकी पहचान आत्मनिर्णय, सामाजिक स्वीकृति, देह, श्रम, मित्रता और मानवीय गरिमा का व्यापक विमर्ष है। प्रस्तुत शोध-पत्र में ‘रेत समाधि‘ में किन्नर विमर्ष के प्रमुख आयाम-लैंगिक अस्मिता, देह, वेषभूषा, परिवार, मित्रता, सामाजिक बहिष्कार, मानवीय गरिमा और आत्मनिर्णय का संक्षिप्त विष्लेषण किया गया है।
References
शर्मा, डाॅ. सुरेन्द्र, हिन्दी साहित्य में किन्नर विमर्ष, मनीष पब्लिकेषन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2021, पृ-92
श्री गीतांजलि, रेत-समाधि, राजकमल प्रकाषन, चैथा संस्करण, जून-2022, पृ-150
वही, पृ-152
वही, पृ-155
वही, पृ-228
वही, पृ-238
वही, पृ-239
वही, पृ-248
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