भगवान दास मोरवाल के उपन्यास “हलाला” में चित्रित धर्म एवं मुस्लिम समाज।
Keywords:
सामाजिक प्राणी, मुस्लिम संप्रदाय, मुस्लिम समाज, भगवान दास जी, षड्यंत्र, डमरू पुरुष, परंपरागत बेड़ियोंAbstract
प्रकृति में जीव, मनुष्य तक पहुंच कर पूर्णता प्राप्त कर लेता है। इससे उत्तम जैविक प्रजातीय रूप में और कोई प्रजाति विकसित नहीं हई। अस्तु मनुष्य ही उच्चतम विकसित प्राणी या जीव प्रजाति है ।यह उच्चतम केवल उसे जैविक या शारीरिक क्षमताओं के कारण ही नहीं बल्कि उसे अन्य प्रजातियों से अलगाने वाला महत्वपूर्ण आधार है- बुद्धि, सोचने की शक्ति। इस बुदधि के बल पर ही मनुष्य नए-नए आविष्कार करता है। जब मनुष्य एक दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आया तो समाज की नीव पड़ी। समाज यूं तो अन्य प्रजातियों का भी होता है जिसका प्रमाण उसका अपने-अपने झुंडों में विचरण करने से मिलता है। परंतु मनुष्य समाज उन सब से अलग इसलिए है क्योंकि वह जीव से आगे सबौद्धिक ,भ्यात्मक एवं सांस्कृतिक समाज के रूप में विकसित हुआ है। किंग्सले डेविस ने भी इस तथ्य को इस प्रकार प्रस्तुत किया है “मनुष्य की इस विशिष्टता का परिचायक यदि कोई एकांकी तत्व है तो वह यही है- समाज। समस्त प्राणी जगत में केवल उसी के पास संस्कृति है।”
अतःस्पष्ट है कि समाज मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। समाज से ही मनुष्य का अस्तित्व है इसलिए कहा भी गया है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक शब्द से तात्पर्य उसकी परस्पर उस अन्योन्याश्रिता से है, जिसके द्वारा उसने अपना आज तक का समग्र विकास किया है। अतः मनुष्य के परिपेक्ष्य में समाज की अवधारणा मात्रा जैविक आवश्यकता भर नहीं है उसके पीछे परस्पर सहयोग, विकसित और सर्वजनहिताय , सुख समृद्धि से जुड़ी वह चेतन संचारित रहती है, जिसके द्वारा वह निरंतर सभ्यता और संस्कृति के नए-नए सोपानों पर आगे बढ़ता चलता है। भार्गव आदर्श हिंदी कोश में, समाज का अर्थ-"समाज सं० पु०, मनुष्य का संगठित समूह, संघ, सभा, समुदाय।” साहित्यकार भी एक सामाजिक प्राणी होता है। साहित्यकार एक विशेष सामाजिक परिवेश में रहकर इससे अनुभव ग्रहण करता हुआ साहित्य की रचना करता है। साहित्य समाज को प्रभावित करता है और समाज साहित्य को। क्योंकि समाज और साहित्य को हम अलग-अलग नहीं देख सकते। यह दोनों एक सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं। समाज अनेक वर्गो में विभाजित होता है। जैसे की लिंग के आधार पर, जाति के आधार पर ,धर्म के आधार पर आदि। जिसके अंदर रहकर मनुष्य में कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयां विद्यमान रहती हैं। आज वर्तमान समय में धर्म के नाम पर जो आडंबर और शोषण देखा जा रहा है वह समाज को गलत दिशा में लेकर जा रहा है। धर्म के ठेकेदारों ने धर्म को अपने-अपने मतानुसार परिभाषित करना शुरू कर दिया है। जिस मनुष्य को अपने हित के ल्रिए जो फायदा दिखाई देता है वह वैसे ही परिभाषा गढ़ लेता है। धर्म और समाज का चोली दमन का संबंध माना जाता है।
References
kingslay davis, Human socity.P.3
प्रोफेसर रामचंद्र पाठक, भार्गव आदर्श हिंदी, शब्दकोश, प्रकाशन 2004 पृष्ठ संख्या 753
डॉ राधाकृष्णन, धर्म एवं समाज, पृष्ठ संख्या 45
अर्चना जैन, प्रेमचंद निबंध साहित्य में सामाजिक चेतना पृष्ठ संख्या 36
भगवान दास मोरवाल,हलाला, पृष्ठ संख्या 134
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